Sunday, January 6, 2013


19 KAUTILYA’S   ‘ARTHASHAASTRA’

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MadanMohan Tarun

Taxation

मात्स्यन्यायाभिभूता प्रजा मनुं वेवस्वतमं राजनंचक्रिरे। राजानं । धान्यषडभागं पण्यदशभागं हिरण्यम चास्य भागधेयम कल्पयामासुः। तेन भृता राजानः प्रजानाम योगक्षेमवहा' तेषां किल्विषं दण्डकरा हरन्ति, योगक्षेमवहाश्च प्रजानाम्। तास्मादुषडभागमारण्यका अपि निवपानति - तस्यैतद्भागदेय योस्मान गोपायतीति।

मात्स्यन्याय से पीडि॰त प्रजा ने वैवस्वत मनु को अपना राजा नियुक्त किया और यह नियम भी बना दिया कि राजा प्रजा से धान्य का छठवाँ भाग, विक्रययोग्य वस्तु का दसवाँ भाग कर रूप में नगद प्राप्त करके उसका योग - क्षेम स्वयं वहन करेगा। प्रजा पर लगाया गया कर या दण्ड पाप- नशक और कल्याणकारी है। इसीलिए वन में वास करनेवाले तपस्वी भी जो कण -कण जोड॰ कर जमा करते है ,उसका भी छठवाँ भाग राजा को कर के रूप में देते हैं। उनके मत में प्रजा के रक्षक राजा को यह कर मिलना उचित है।

Subjects suffering from Matsya nyaaya , appointed Vaivaswat manu as their king and constituted a rule that a king will take sixth part of their grains, tenth part of their salable items in cash as a tax from his subjects to take care of them in every respect. Whatever tax or punishment is imposed upon the subjects ,cleans their sin and it goes in their favor. Even saints who live in jungles and collect grains from here and there pay the sixth part of it as a tax to the king. According to them a king as a protector has right to get tax.

(From ‘Kautilya’s ‘ARTHASHAASTRA’ by MadanMohan Tarun)

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