Sunday, September 3, 2017

द्यावा-पृथिवी

ऋगवेद से 18 उषा उषा और रात्रि सूर्यदेव की सखाओं की भाँति हैं।वे एक दूसरे के प्रभाव का शमन करती हुई भी सहगामिनी हैं। वे अविनाशी और सतत यात्री हैं। रात्रि और उषा दोनों बहनें हैं। उनका रूप-रंग और स्वभाव  भिन्न है।एक कृष्णवर्णा हैं और दूसरी गौरवर्णा।वे एक-दूसरे का सम्मान करती हैं।जिस प्रकार बड़ी बहन के आने पर उनके सम्मान में छोटी बहन अपना आसन छोड़ देती हैं, उसी प्रकार उषा का पदचाप सुनते ही रात्रि अपना स्थान छोड़ देती है। प्रकाशमयी उषा, मृतकों के समान प्रसुप्त संसार में प्राण-प्रदीप्त कर  सब को नवजीवन से भर देती हैं। सदा अभिवृद्धिमान ,अपने -परायों के प्रति समान भाववाली मनोमय उषा , आनंद का विस्तार करती हुई सबको आह्लादित करती हैं। जैसे गोशाला से सभी पशु एक साथ निकल कर बाहर चारों ओर फैल जाते हैं, जैसे जलवृद्धि से उफनती - उमगती नदियाँ समस्त बंधनों से मुक्त होकर अपना विस्तार करती चल पड़ती हैं, उसी प्रकार उषा की रश्मियाँ समस्त दिशाओं को आच्छादित कर आलोकमय बना देती हैं। हे उषा! आपके आते ही यज्ञकर्ता अग्नि प्रदीप्त करने लगे। हे उषा!आपने सूर्योदय के पूर्व ही संसार को प्रकाशित कर दिया। मदनमोहन तरुण

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