Wednesday, December 5, 2012

Dhelmarbaa Devata MadanMohan Tarun


ढेलमरबा देवता
मदनमोहन तरुण
मेरे गाँव के बगल के गाँव में एक खंडित शिवलिंग था। उसके बारे में प्रसिद्दि थी कि जो भी शिवजी को ढेला मारकर अपना कोई कार्य आरम्भ करता है ,उसका काम अवश्य होता है।अतः किसी शुभ कार्य का आरम्भ करने से पहले लोग शिवजी को ढेला मारना नहीं भूलते थे। मैं स्वयम भी परीक्षा आरम्भ होने के पहले अपने मित्रों के साथ शिवजी पर ढेला बरसा चुका था। मगर यह बात मेरे गले नही उतर रही थी कि शिवजी ढेला खाए बिना कोई काम ही नहीं करते थे।
एकदिन मैंने इस बारे में बाबा से पूछा। मेरा प्रश्न सुनकर बाबा मुस्कुराए और उन्होंने शिवजी के ढेला खाने का जो रहस्य बताया ,उसे सुन कर मैं खुद मुस्कुरा उठा। बाबा ने बताया कि इस बात की खोज करने पर उन्हें पता चला कि आज से बहुत पहले एक सज्जन शिवजी के बहुत बडे॰ भक्त थे।किन्तु शिवभक्ति से उनका कोई काम पूरा नहीं हुआ।इससे क्रोधित होकर एकदिन उन्होंने शिव जी पर लाठी और पत्थरों का इतना प्रहार किया कि शिवलिंग खंडित हो गया और संयोग देखिए कि उसके दूसरे दिन ही उनका रुका काम पूरा हो गया। तभी से यह शिवलिंग ढेलमरवा देवता के नाम से प्रसिद्द होगया और यह मान लिया गया कि शिवजी ढेला खाए बिना कोई काम पूरा नहीं करते। जोभी इन्हें ढेला मरता है ,उसका कार्य सिद्द हो जाता है। तबसे शिवजी ढेलों की इतनी मार खा चुके हैं कि अब उनका अस्तित्व ही संकट में आगया है।सुनकर मैं भी मुस्काए बिना नहीं रह सका।

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